Updated: 27 October 2026
छठ सूर्य की उपासना का पर्व है। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। मुख्य पर्व कार्तिक मास में होता है। तिथियों और समय के लिए मुख्य लेख देखें: https://gramsuvidha.co.in/chhath-puja-2026-date-vidhi/ व्रत के नियमों के लिए देखें: https://gramsuvidha.co.in/chhath-puja-niyam-dos-donts/
कथा या इतिहास?
छठ के बारे में तीन स्तरों को अलग रखना चाहिए। पहला स्तर: वेदों में सूर्य और उषा के सूक्त मिलते हैं। दूसरा स्तर: पौराणिक और लोक कथाएं कर्ण, द्रौपदी और सीता की परंपराएं अलग-अलग हैं। इन्हें परंपरा के रूप मानें, स्थापित इतिहास नहीं। तीसरा स्तर: हाल के दशकों में प्रवास और नदी किनारे जमावड़े से छठ महानगरों और विदेशों में भी फैला है।
चैती छठ बनाम कार्तिक छठ
चैती छठ चैत्र मास में मनाई जाती है, जबकि मुख्य छठ कार्तिक मास में होती है और बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।
छठ का महत्व: सूर्य, नदी और व्रत
भक्तों की मान्यता में सूर्य जीवन और ऊर्जा का स्रोत है, इसलिए कृतज्ञता में अर्घ्य दिया जाता है। नदी और तालाब के किनारे पूजा सामूहिक आस्था और प्रकृति से जुड़ाव दिखाती है। व्रत भक्तों के लिए संयम और भक्ति का रूप है।
नए प्रश्न और उत्तर
छठ क्या है?
सूर्य और छठी मइया की उपासना का पर्व है, मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है।
छठ क्यों कहा जाता है?
कार्तिक शुक्ल षष्ठी के कारण। षष्ठी से ही छठ नाम पड़ा है।
चैती और कार्तिक छठ में क्या अंतर है?
चैती छठ चैत्र मास में होती है। कार्तिक छठ मुख्य पर्व है और बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।
क्या बौद्ध मूल का सिद्धांत सिद्ध है?
नहीं। यह एक विवादित सिद्धांत है, स्थापित तथ्य नहीं।
बिहार की गलियों में जब छठ के गीत गूंजते हैं, तो हर बिहारी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठ पूजा क्यों मनाई जाती है? सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? छठी मइया कौन हैं, और महाभारत-रामायण से इस पर्व का क्या संबंध है? इस लेख में हम Chhath Puja ka itihas, इसकी पौराणिक कथाओं, वैदिक जड़ों और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से समझेंगे।
छठ पूजा क्या है — एक परिचय

छठ पूजा हिंदू धर्म का एक प्राचीन पर्व है जो भगवान सूर्य (सूर्य देव) और छठी मइया को समर्पित है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है — “छठ” शब्द षष्ठी का ही भोजपुरी-मैथिली रूप है।
इस पर्व की सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें न किसी मूर्ति की पूजा होती है, न किसी पुजारी की आवश्यकता होती है। व्रती सीधे प्रकृति के सामने — नदी या तालाब के जल में खड़े होकर — डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देता है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का जीवंत उत्सव है।
छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है, लेकिन प्रवासी भारतीयों के कारण अब यह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों और विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाने लगा है।
छठ पूजा क्यों मनाई जाती है — धार्मिक और वैज्ञानिक कारण
1. सूर्य के प्रति कृतज्ञता
हिंदू धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है — वह एकमात्र देवता हैं जिन्हें रोज आंखों से देखा जा सकता है। वेदों में सूर्य को “जगत की आत्मा” कहा गया है। छठ में सूर्य को अर्घ्य देकर जीवन, ऊर्जा और प्रकृति के संतुलन के लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
2. प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान
छठ पूजा के सभी अनुष्ठानों में प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का प्रयोग होता है — बांस का सूप, मिट्टी के दीये, गन्ना, फल, गंगाजल। प्लास्टिक का कोई स्थान नहीं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
3. संतान और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना
छठी मइया को संतान की रक्षिका माना जाता है। निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए और संतान वाले माता-पिता बच्चों की लंबी आयु व स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखते हैं।
4. आत्म-अनुशासन और शुद्धि
चार दिन के नियम, 36 घंटे का निर्जला व्रत, सात्विक भोजन और मौन — यह सब मन और शरीर की शुद्धि का माध्यम है। छठ व्रत संयम, धैर्य और भक्ति की परीक्षा है।
5. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
कुछ विद्वानों के अनुसार, छठ के समय (अक्टूबर-नवंबर) शरीर को सर्दियों के लिए तैयार करने में सूर्य की किरणों का विशेष महत्व है। सुबह-शाम सूर्य के सामने खड़े होने से शरीर को विटामिन डी मिलता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
छठ पूजा का इतिहास — वैदिक काल से आज तक
छठ पूजा भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन निरंतर मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है।
वैदिक जड़ें
ऋग्वेद और अथर्ववेद में सूर्य और उषा (भोर) को समर्पित कई सूक्त हैं — आधुनिक छठ के मंत्र इन्हीं से लिए गए हैं। वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा समाज का केंद्र थी, और सूर्य उपासना उसी परंपरा का विस्तार है।
पुराणों में उल्लेख
ब्रह्मवैवर्त पुराण में छठी मइया (षष्ठी देवी) की पूजा का वर्णन मिलता है। उन्हें ब्रह्मा की मानसपुत्री और प्रकृति देवी का छठा रूप माना गया है।
मध्यकाल और आधुनिक विस्तार
कुछ परंपराओं के अनुसार छठ पूजा की शुरुआत वाराणसी में गहड़वाल वंश के समय हुई। पहले यह केवल बिहार-झारखंड तक सीमित था, लेकिन 20वीं-21वीं सदी में प्रवास के कारण यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्व बन गया। आज अमेरिका, मॉरीशस, फिजी और खाड़ी देशों में भी छठ मनाया जाता है।
छठ पूजा की पौराणिक कथाएं
छठ से जुड़ी कई कथाएं हैं — हर कथा इस व्रत की महिमा को दर्शाती है।
कथा 1: द्रौपदी और पांडव (महाभारत)

महाभारत के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना राज्य हारकर वनवास भोग रहे थे, तब ऋषि धौम्य के परामर्श पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा। यह व्रत निर्जला था — सूर्यास्त के समय ठंडे जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य, फिर भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य। पांडवों ने भी उनके साथ यह व्रत किया। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को उनका राज्य वापस मिला और कौरवों का नाश हुआ।
कथा 2: भगवान राम और माता सीता (रामायण)
एक प्रचलित कथा के अनुसार, जब भगवान राम और माता सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो राज्य की सुख-समृद्धि के लिए उन्होंने सूर्य षष्ठी का व्रत किया। माता सीता ने नदी में घुटनों तक जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। मान्यता है कि इसी व्रत के फलस्वरूप उन्हें लव और कुश जैसे पुत्रों की प्राप्ति हुई। मुंगेर (बिहार) का सीताचरण मंदिर — गंगा के बीच एक शिला पर स्थित — इसी कथा से जुड़ा है; कहा जाता है कि माता सीता ने यहीं छठ किया था।
कथा 3: सूर्यपुत्र कर्ण (महाभारत)
महादानी कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे और उनके परम भक्त भी। वे रोज सुबह कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे — यही पद्धति आज छठ पूजा का आधार है। कर्ण की इस नित्य उपासना को छठ व्रत की प्रेरणा माना जाता है।
कथा 4: राजा प्रियव्रत और छठी मइया
स्वयंभू मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत संतानहीन थे। महर्षि कश्यप के कहने पर उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। दुखी राजा जब प्राण त्यागने लगे, तो आकाश में देवी षष्ठी प्रकट हुईं। उन्होंने कहा — “मैं ब्रह्मा की पुत्री छठी मइया हूं, संसार के सभी बच्चों की रक्षा करती हूं।” उन्होंने मृत बालक को स्पर्श किया और वह जीवित हो उठा। तभी से राजा ने षष्ठी देवी की पूजा शुरू की, जो कालांतर में छठ पूजा के रूप में फैली।
छठी मइया कौन हैं?
छठ पूजा में सूर्य देव के साथ छठी मइया (षष्ठी देवी) की भी पूजा होती है। विभिन्न परंपराओं के अनुसार:
- वे प्रकृति देवी का छठा रूप हैं — इसलिए “छठी” मइया।
- उन्हें देवसेना भी कहा जाता है — बच्चों की रक्षिका।
- कुछ मान्यताओं में वे सूर्य देव की बहन हैं।
- कुछ परंपराओं में उन्हें देवी पार्वती का ही एक रूप माना जाता है।
संतान की कामना, बच्चों की लंबी आयु और परिवार की रक्षा के लिए विशेष रूप से छठी मइया की पूजा की जाती है।
छठ को “महापर्व” क्यों कहा जाता है?
छठ को बिहार-झारखंड में “महापर्व” कहा जाता है — इसके कई कारण हैं:
- कठिनतम व्रत: 36 घंटे का निर्जला व्रत हिंदू परंपरा के सबसे कठिन व्रतों में से एक है।
- सामूहिकता: पूरा परिवार, पड़ोस और गांव एक साथ घाट पर जुटता है — यह सामाजिक एकता का पर्व है।
- प्रकृति पूजा: बिना मूर्ति, बिना पुजारी — सीधे सूर्य, जल और प्रकृति की पूजा।
- समानता: छठ में जाति-पाति का भेद नहीं — घाट पर सभी एक साथ खड़े होते हैं।
- प्रवासी भावना: छठ के समय बिहार-झारखंड के लाखों प्रवासी घर लौटते हैं — यह घर वापसी का पर्व भी है।
छठ पूजा कहां-कहां मनाई जाती है
- बिहार: सबसे पारंपरिक रूप — पटना के गंगा घाट, मुंगेर, भागलपुर, दरभंगा में लाखों की भीड़।
- झारखंड: रांची, जमशेदपुर, धनबाद में सामुदायिक आयोजन।
- पूर्वी उत्तर प्रदेश: वाराणसी, बलिया, गोरखपुर में भव्य आयोजन।
- नेपाल: तराई क्षेत्र (जनकपुर, वीरगंज) में राष्ट्रीय पर्व की तरह।
- महानगर: दिल्ली (यमुना घाट), मुंबई (जुहू), कोलकाता में कृत्रिम घाटों पर आयोजन।
- विदेश: अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, खाड़ी देशों में प्रवासी भारतीयों द्वारा।
वैदिक ग्रंथों में सूर्य उपासना — विस्तृत दृष्टि
छठ की वैदिक जड़ों को समझने के लिए हमें वेदों में सूर्य-सूक्तों को देखना होगा:
- ऋग्वेद (1.50): सूर्य देव को समर्पित प्रसिद्ध सूक्त — “उद्वयं तमसस्परि” से शुरू होता है। इसमें सूर्य को अंधकार का नाशक और जीवनदाता कहा गया है।
- गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10): सविता (सूर्य) को समर्पित — हिंदू धर्म का सबसे पवित्र मंत्र सूर्य की ही स्तुति है।
- अथर्ववेद: सूर्य की किरणों को रोगनाशक बताया गया है — “सूर्य की किरणें कीटाणुओं का नाश करती हैं।”
- आदित्य हृदयम् (रामायण, युद्धकांड): ऋषि अगस्त्य ने भगवान राम को सूर्य की उपासना का उपदेश दिया था — यही परंपरा छठ में जीवित है।
छठ में गाए जाने वाले कई मंत्र इन्हीं वैदिक सूक्तों से लिए गए हैं — यह पर्व वैदिक सूर्य-उपासना का लोक रूप है।
भारत के प्रसिद्ध छठ घाट

छठ के समय ये घाट आस्था के केंद्र बन जाते हैं:
- पटना (बिहार): गंगा के घाट — कलेक्ट्रेट घाट, गांधी घाट पर लाखों की भीड़।
- मुंगेर (बिहार): सीताचरण मंदिर — गंगा के बीच शिला पर स्थित, सीता कथा से जुड़ा।
- देव (औरंगाबाद, बिहार): प्रसिद्ध सूर्य मंदिर — छठ के समय विशेष पूजा।
- वाराणसी (यूपी): अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट पर भव्य आयोजन।
- रांची (झारखंड): धुर्वा डैम और हटिया डैम के किनारे सामुदायिक छठ।
- दिल्ली: यमुना के घाट (आईटीओ, वजीराबाद) और कृत्रिम तालाबों पर आयोजन।
- जनकपुर (नेपाल): गंगा सागर पोखर पर राष्ट्रीय स्तर का आयोजन।
छठ और लोक संस्कृति
छठ सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं — यह लोक संस्कृति का महोत्सव है:
- लोकगीत: शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास जैसे कलाकारों ने छठ गीतों को अमर कर दिया।
- लोककला: घरों में कोहबर (दीवार चित्र), सूप पर अल्पना बनाई जाती है।
- सामुदायिक भोजन: खरना के बाद पूरे मोहल्ले में प्रसाद बंटता है — सामाजिक बंधन मजबूत होता है।
- प्रवासी संस्कृति: छठ के गीतों में परदेश गए बेटे की घर वापसी की भावना झलकती है।
आधुनिक छठ — परंपरा और पर्यावरण का संतुलन
आज छठ मनाने के तरीके में कुछ आधुनिक बदलाव आए हैं:
- कृत्रिम घाट: महानगरों में नगर निगम कृत्रिम तालाब बनाते हैं ताकि नदियों पर दबाव न पड़े।
- ईको-फ्रेंडली अभियान: प्लास्टिक-मुक्त छठ के लिए स्वयंसेवी संगठन जागरूकता चलाते हैं।
- सुरक्षा व्यवस्था: बड़े घाटों पर पुलिस, गोताखोर और मेडिकल टीमें तैनात रहती हैं।
- डिजिटल छठ: प्रवासी वीडियो कॉल पर परिवार के साथ अर्घ्य में शामिल होते हैं।
लेकिन मूल विधि — निर्जला व्रत, बांस का सूप, मिट्टी के दीये, डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य — आज भी वैसी ही है जैसी सदियों से चली आ रही है।
छठ बनाम अन्य सूर्य पर्व
भारत में सूर्य से जुड़े कई पर्व हैं — छठ उनमें सबसे अनोखा है:
- मकर संक्रांति: सूर्य के उत्तरायण का पर्व — स्नान-दान प्रधान, लेकिन निर्जला व्रत नहीं।
- रथ सप्तमी: दक्षिण भारत में सूर्य जयंती — मंदिरों में विशेष पूजा, लेकिन घाट-संस्कृति नहीं।
- छठ: एकमात्र पर्व जिसमें डूबते और उगते दोनों सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य दिया जाता है, 36 घंटे निर्जला व्रत के साथ।
छठ की विशेषता है इसका लोक चरित्र — यह मंदिरों का नहीं, नदियों-घाटों का पर्व है; पुरोहितों का नहीं, घर की महिलाओं का पर्व है।
छठ पूजा 2026 — मुख्य तिथियां एक नजर में
त्वरित संदर्भ के लिए 2026 की सत्यापित तिथियां (पूरी दिन-वार विधि के लिए हमारा छठ पूजा 2026 तिथि और विधि लेख देखें):
- 13 नवंबर (शुक्रवार): नहाय खाय — शुद्धि की शुरुआत
- 14 नवंबर (शनिवार): खरना — दिन भर उपवास, सूर्यास्त पर खीर-प्रसाद
- 15 नवंबर (रविवार): संध्या अर्घ्य — मुख्य दिन, डूबते सूर्य को अर्घ्य
- 16 नवंबर (सोमवार): उषा अर्घ्य और पारण — उगते सूर्य को अर्घ्य, व्रत समाप्त
तिथियां Drik Panchang से सत्यापित हैं: 15 नवंबर की शाम सूर्यास्त के समय षष्ठी तिथि विद्यमान रहेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
छठ पूजा क्यों मनाई जाती है?
सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, छठी मइया से संतान व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करने और प्रकृति का सम्मान करने के लिए।
छठी मइया कौन हैं?
छठी मइया (षष्ठी देवी) प्रकृति देवी का छठा रूप मानी जाती हैं — बच्चों की रक्षिका। कुछ परंपराओं में वे सूर्य देव की बहन हैं।
छठ पूजा की शुरुआत किसने की थी?
पौराणिक कथाओं के अनुसार द्रौपदी-पांडवों, राम-सीता और कर्ण ने छठ व्रत किया था। राजा प्रियव्रत की कथा में छठी मइया की पूजा की शुरुआत का वर्णन है।
छठ पूजा का इतिहास कितना पुराना है?
इसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं — ऋग्वेद और अथर्ववेद में सूर्य-उषा के सूक्त मिलते हैं। यह भारत के सबसे प्राचीन निरंतर पर्वों में से एक है।
छठ में मूर्ति पूजा क्यों नहीं होती?
छठ प्रकृति की सीधी उपासना है — सूर्य, जल और आकाश ही देवता हैं। इसलिए मूर्ति या पुजारी की आवश्यकता नहीं होती।
क्या पुरुष भी छठ व्रत रख सकते हैं?
हां। परंपरागत रूप से महिलाएं (व्रती) यह व्रत रखती हैं, लेकिन छठ लिंग-विशिष्ट पर्व नहीं है — पुरुष भी व्रत रखते हैं, और यह प्रचलन बढ़ रहा है।
यह एक निजी सूचना पोर्टल है (सरकारी वेबसाइट नहीं)। पौराणिक कथाएं विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं पर आधारित हैं — मान्यताएं क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।





